धूप खिलीं फ़िज़ायें सर्द हैं,
बिल्कुल वैसीं जैसी उस देस हुआ करती हैं,
जहां चैन मिलता है, सुकून पलता है,
हर पल कोई ख़्वाब खिलता है...
अब जब तैयार हूँ खड़ा,
के चल दूँ उस देस की डगर,
अब मेरे गाँव में भी, कुछ
वैसा ही समां है इधर...
लगता है जैसे मौसम,
गीतों से अपने मुझे रोक रहा,
मैं चला अपनों से दूर,
और जैसे ये लगातार टोक रहा...
पर जानता है मेरा ये दिल,
के अब वहीँ है मेरी मंज़िल,
और वहीँ है अगले सफ़र...
पंख लगा उड़ता हो जैसे ये जिगर,
अब न रही इसे किसी मौसम की फिकर,
न ही तन्हाई का है इसे डर...
अब तो बस लगे, जहां हो बसर,
करूं कुछ ऐसा हर शहर,
के रोज़ खिले धूप हँस के उस डगर,
चलें फ़िज़ायें खुशनुमा हर पहर...
बस जी लूं जो मिले पल,
जी लूं इन्हें बेफ़िकर...
LiveStrong :)
बिल्कुल वैसीं जैसी उस देस हुआ करती हैं,
जहां चैन मिलता है, सुकून पलता है,
हर पल कोई ख़्वाब खिलता है...
अब जब तैयार हूँ खड़ा,
के चल दूँ उस देस की डगर,
अब मेरे गाँव में भी, कुछ
वैसा ही समां है इधर...
लगता है जैसे मौसम,
गीतों से अपने मुझे रोक रहा,
मैं चला अपनों से दूर,
और जैसे ये लगातार टोक रहा...
पर जानता है मेरा ये दिल,
के अब वहीँ है मेरी मंज़िल,
और वहीँ है अगले सफ़र...
पंख लगा उड़ता हो जैसे ये जिगर,
अब न रही इसे किसी मौसम की फिकर,
न ही तन्हाई का है इसे डर...
अब तो बस लगे, जहां हो बसर,
करूं कुछ ऐसा हर शहर,
के रोज़ खिले धूप हँस के उस डगर,
चलें फ़िज़ायें खुशनुमा हर पहर...
बस जी लूं जो मिले पल,
जी लूं इन्हें बेफ़िकर...
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